History of City Palace Jaipur in Hindi – सिटी पैलेस जयपुर का इतिहास हिंदी में

city palace jaipur पिछोला झील के किनारे में स्थित एक दर्शनीय स्थान है | इस महल का निर्माण महाराणा उदय सिंह ने 1559 ईस्वी से शुर करवाया था जिसे बाद के महाराणाओ ने इसमें ओर महल जोडकर इस जगह को को एक अनोखा महल बनाया |

सिटी पैलेस में प्रवेश के लिए प्रथम द्वार “हाथी पोल” है | उसके बाद बड़ी पोल से होते हुए त्रिपोलिया गेट तक पहुचते है जिसका निर्माण 1725 ईस्वी में हुआ था |

पहले एक रीती रिवाज के अनुसार द्वार में प्रवेश करने से पूर्व महाराणा को उनके बराबर के सोने चांदी से तोला जाता था जो आम जनता में बाट दिया जाता था |

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सिटी पैलेस जयपुर  – city palace jaipur rajasthan

सूरज गोखड़ा वो जगह है जहा से महाराणा मुश्किल समय में आम जनता की फरियाद सुनते थे | मोर चौक का नाम इसके नीले पच्चीकारी की वजह से दिया गया |

सिटी पैलेस के मुख्य भाग को संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया जिसमे विशाल और अलग अलग प्रकार की कलाकृतिया सजी हुयी है मुख्य द्वार से नीचे की तरफ शस्त्रागार संग्रहालय है जिसमे सुरक्षात्मक औजारों का विशाल संग्रह है |

इसी संग्रहालय में महाराणा प्रताप की घातक दोधारी तलवार भी रखी हुयी है |इसके बाद सिटी पैलेस संग्रहालय में गणेश द्वार है जिसका रास्ता राज्य अनजान की ओर जाता है | ये जगह एक शाही आंगन है जहा पर महाराणा ऋषियों से मिला कर शहर की चर्चा करते थे |

इस महल के सभी कक्ष सुंदर दर्पण टाइल्स और चित्रकारी से सजे हुए है | माणक महल में कांच के काम का सुंदर संग्रह है जबकि कृष्ण विलास में लघु चित्रों का संग्रह है

मोती महल में सुंदर कांच का काम किया हुआ है और चीनी महल में आभुषन जडित फर्श टाइल्स जड़ी हुयी है | सूर्य चोपड़ में एक बहुत विशाल आभुषण जडित सूर्य बना हुआ है जो सूर्य वंश को दर्शाता है जिससे मेवाड़ वंश संबंध रखता था |

बाड़ी महल एक बाग़ है जिससे शहर का सुंदर दृश्य नजर आता है जनाना महल में भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है जो सफ़ेद आंगन में लक्ष्मी चौक में खुलता है |

 पैलेस का नाम  सिटी पैलेस
 स्थान  उदयपुर, राजस्थान (भारत)
 निर्माणकाल  16वीं शताब्दी
 निर्माण साल   सन 1559
 निर्माता   उदय सिंह
 पैलेस के दरवाजे  मुख्य तीन दरवाजे
 दरवाजे के नाम  वीरेन्द्र पोल , उदय पोल, त्रिपोलिया गेट

सिटी पैलेस जयपुर के बारे में जानकारी – Information about city palace jaipur

भारत का सबसे शाही और अद्भुत राज्य राजस्थान अपनी भौगोलिक विभिन्नता, सांकृतिक वातावरण और ऐतिहासिक स्थलों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

राजस्थान में दो सिटी पैलेस है एक जयपुर में स्थित है तो दूसरा राजस्थान के सबसे शाही नगर उदयपुर में स्थित है। उदयपुर का सिटी पैलेस जयपुर में स्थित सिटी पैलेस से काफी भिन्न है, यह महल जयपुर में स्थित महल से काफी समय पहले बनाया गया था।

सिटी पैलेस जयपुर का इतिहास – History of city palace jaipur

विश्व प्रसिद्ध अद्भुत महल का निर्माण लगभग 400 वर्षो पहले महाराणा उदय सिंह Iऔर उनके उत्तराधिकारी महाराणा द्वारा किया गया था। वर्ष 1537 ई. में महाराणा उदय सिंह ने चित्तोढ़ में मेवाढ़ साम्राज्य की स्थापना की थी| 

परंतु उस समय उन्हें अपने पहले किले को मुगलों के हाथो में जाता देखता रहना पड़ा था इसलिए उन्होंने बाद में पिचोला झील के पास एक स्थान को चुना जोकि वनों, झीलों और अरावली पहाड़ियों द्वारा सभी तरफ से अच्छी तरह से संरक्षित था।

वर्ष 1572 ई. में उदय सिंह की मौत के बाद उनके बेटे महाराणा प्रताप ने उदयपुर की सत्ता को संभाला हालांकि 1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध में वह मुगल सम्राट अकबर से पराजित हो गये जिसके बाद उदयपुर पर मुगलो का शासन चलने लगा था।

अकबर की मौत के बाद मेवाढ़ को महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह प्रथम को जहांगीर ने वापस दे दिया था। वर्ष 1761 के बाद में मराठों के हमलों के उदयपुर में साक्ष्य आज भी वहाँ के खंडहरो में देखे जा सकते है।

18वीं शताब्दी में यह किला और क्षेत्र अंग्रेजो के अधीन आ गया था जिसे स्वतंत्रता के बाद भारत में मिला लिया गया था।सिटी पैलेस का इतिहास शुरू से ही जयपुर शहर और उसके शासको के इतिहास से जुड़ा हुआ है| 

जिसकी शुरुवात महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय से होती है, जिन्होंने 1699 से 1744 तक शहर पर राज किया था।महल के निर्माण का श्रेय सबसे पहले उन्ही को दिया जाता है, क्योकि उन्होंने ही महल में काफी एकरो तक फैलने वाली दीवार के निर्माण की शुरुवात यहाँ की थी।

शुरू में महाराजा अपने शहर अम्बेर से जयपुर पर शासन करते थे, जो जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है।लेकिन 1727 में अम्बेर में जनसँख्या की समस्या और पानी की कमी होने के कारण उन्होंने जयपुर को अपनी राजधानी बनाया।

उन्होंने वास्तुशास्त्र के अनुसार इस शहर को 6 अलग-अलग भागो में बाटने की योजना बना रखी थी।यह सब उन्होंने अपने सलाहकार विद्याधर भट्टाचार्य के कहने पर किया था, जो नैनीताल में रहने वाले एक बंगाली आर्किटेक्ट थे।

शुरू में वे अम्बेर के खजाने के अकाउंट-क्लर्क थे और बाद में राजा ने उन्हें दरबार का मुख्य आर्किटेक्ट बनाया था।1957 में जयसिंह की मृत्यु होने के बाद, क्षेत्र के राजपूतो के बीच ही आपसी युद्ध होने लगे थे लेकिन ब्रिटिश राज के साथ उन्होंने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाये रखे थे।

1857 के सिपॉय विद्रोह में महाराजा राम सिंह ने ब्रिटिशो का साथ भी दिया और खुद को शाही शासक के रूप में स्थापित किया।कहा जाता है जयपुर की सभी धरोहरों के गुलाबी होने का यही कारण है| 

सूत्रों के अनुसार शासक की योजनाओ के अनुसार ही शहर को पिंक सिटी उर्फ़ गुलाबी शहर का नाम दिया गया। तभी से यह रंग जयपुर शहर का ट्रेडमार्क बन चूका है।

महाराजा माधो सिंह द्वितीय द्वारा दत्तक लिए हुए पुत्र मान सिंह द्वितीय ही जयपुर के अंतिम महाराजा थे, जिन्होंने जयपुर के चंद्र महल पर शासन किया था।

शुरू से ही यह महल शाही परिवारो के रहने की जगह बन चूका है, बल्कि 1949 में राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर के साथ जयपुर साम्राज्य के इंडियन यूनियन में शामिल होने के बावजूद यहाँ शाही परिवार ही रहते थे।

इसके बाद जयपुर को भारतीय राज्य राजस्थान की राजधानी बनाया गया और मान सिंह द्वितीय को राजप्रमुख बनाया गया और बाद में उन्हें स्पेन में भारत का एम्बेसडर भी बनाया गया।

सिटी पैलेस जयपुर की संरचना – structure of city palace jaipur

सिटी पैलेस जयपुर शहर के मध्य-उत्तरपूर्वी भाग में बना हुआ है, जिसका परिसर काफी फैला हुआ है। इसका परिसर बहुत से महलो, बागो, मंडपों और मंदिरों से घिरा हुआ है।

परिसर के अंदर की सबसे प्रसिद्द धरोहरों में चंद्र महल, मुबारक महल, मुकुट महल, महारानी महल, श्री गोविन्द देव मंदिर और सिटी पैलेस म्यूजियम शामिल है।

सिटी पैलेस के वास्तुकार कौन थे और किस वास्तुकला में बनाया गया है? –

इस भव्य महल को मुग़ल शिल्पशास्त्र और यूरोपीय शैली की वास्तुकला के मेल से बनाया गया है। इस महल के कोने कोने में आप रंग डिज़ाइन कला और संस्कृति का सही मेल देख सकते है।

इस सुंदर कला के वास्तुकार विधाधर भट्टाचार्य और अंग्रेज शिल्पकार सर सैमुअल स्विटंन जैकब थे।

जयपुर सिटी पैलेस मुख्य द्वार –

सिटी पैलेस के मुख्य प्रवेश द्वारो में

वीरेन्द्र पोल

उदय पोल

त्रिपोलिया गेट शामिल है।

जिनमे से त्रिपोलिया गेट से केवल शाही परिवार के लोग ही प्रवेश करते है।सामान्य जनता और यात्रियों को सिटी पैलेस के अंदर वीरेन्द्र पोल और उदय पोल या आतिश पोल से प्रवेश दिया जाता है।

वीरेन्द्र पोल से प्रवेश करने के बाद यह हमें सीधे मुबारक महल के पास ले जाता है। सिटी पैलेस के प्रवेश द्वारा प्राचीन वास्तुकला से सुशोभित है।

शहर का महल जयपुर अन्य स्मारकों में – Other monuments in city palace jaipur

मुबारक महल :

मुबारक महल का अर्थ ‘शुभ महल’ से है, जिसे इस्लामिक, राजपूत और यूरोपियन वास्तुकला स्टाइल की कल्पनाओ के आधार में 19 वी शताब्दी में महाराजा माधो सिंह द्वितीय ने रिसेप्शन सेंटर के रूप में बनवाया था।

यह एक म्यूजियम है : जिसमे शाही परिवार की पोशाख और उनके वस्त्रो, शॉल, कश्मीरी वस्त्रो, प्राचीन साड़ी इत्यादि का प्रदर्शन किया गया है।

साथ ही यहाँ सवाई माधो सिंह प्रथम द्वारा धारण किये गये वस्त्रो का प्रदर्शन भी किया गया है, जो 1.2 मीटर चौड़े है और जिनका वजन 250 किलो है और कहा जाता है की उनकी 108 पत्नियाँ थी।

प्रीतम निवास चौक :

यह महल का भीतरी आंगन है, जहाँ से हम चंद्र महल भी जा सकते है। यहाँ चार छोटे द्वार भी है, जो हिन्दू भगवान की थीम से विभूषित है।

इन द्वारो में मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी मोर द्वार (इस द्वार पर मोर की आकृति बनी हुई है) है जो पतझड़ का भी प्रतिनिधित्व करते है और यह द्वार भगवान विष्णु को समर्पित है| 

दक्षिणपूर्वी द्वार कमल द्वार है, जो गर्मी के मौसम का प्रतिनिधित्व करता है और यह द्वार भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है, उत्तर-पश्चिमी द्वार हरा द्वार है, जिसे लहेरिया भी कहा जाता है और यह द्वार भगवान गणेश को समर्पित है| 

 अंतिम द्वार गुलाब द्वार है जो देवियों को समर्पित है और इस अंतिम द्वार पर भी फूलो की आकृति बनाई गयी है।

दीवान-ए-खास :

दीवान-ए-खास एक करामाती कक्ष है, जिसकी छतो को महंगे लाल और सुनहरे रंगों से सजाया गया है, जो आज भी हमें जीवंत लगते है। मुबारक महल के परिसर का यह मुख्य आकर्षण का केंद्र है।

इस कक्ष का उपयोग वर्तमान में आर्ट गैलरी के रूप में किया जा रहा है, बहुत सी प्राचीन राजस्थानी, मुघल और पर्शियन चित्रों, प्राचीन शिलालेखो और कश्मीरी कारपेट का प्रदर्शन किया जाता है।

इसकी छत को भी खूबसूरती से सजाया गया है। इस आर्ट गैलरी में प्राचीन मनुस्म्रुतियो को भी दर्शाया गया है। साथ ही इस आर्ट गैलरी में हमें शाही सिंहासन (तख़्त ए रावल) भी देखने मिलता है, जो सार्वजानिक श्रोताओ के समय महाराजा की कुर्सी हुआ करती थी।

महल के बाहर जब महाराजा यात्रा करते जाते थे तो उनके वे हाथी पर सवार होकर अपने घुड़सवारीयो के साथ जाते थे और उनके साथ एक पालकी धारक भी होता था। इस हॉल के प्रवेश द्वार पर मार्बल पत्थरों से दो विशाल हाथियों को बनाया गया है।

दीवान-ए-आम :

दीवान ए आम सार्वजानिक श्रोताओ का एक हॉल है। इस हॉल को सतह को मार्बल से सजाया गया है। साथ ही यहाँ 1.6 मीटर ऊँचे चाँदी के बर्तन भी है, जिनमे 4000 लीटर की क्षमता है और उनका वजन तक़रीबन 340 किलोग्राम है।

इनका निर्माण 14000 चाँदी के सिक्को को पिघलाकर उन्हें टाके बिना ही किया गया था।इनके नाम दुनिया के सबसे विशाल चाँदी के बर्तन होने का भी रिकॉर्ड है।

इन बर्तनो का निर्माण महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय ने करवाया था, जो एक पवित्र हिन्दू थे।उन्होंने इन बर्तनो का निर्माण 1901 में उनकी इंग्लैंड यात्रा के दौरान गंगा का पानी पिने के लिए ले जाने के लिए किया था|

क्योकि उनके अनुसार यदि वे इंग्लिश पानी का सेवन करते तो उनका हिन्दू धर्म भ्रष्ट हो जाता। इसके बाद इन बर्तनों का नाम भी गंगाजली रखा गया था।

यहाँ पर क्रिस्टल से सुशोभित बहुत से झूमर भी बने हुए है, जो दीवान ए आम की छत पर लटके हुए है, जिन्हें वर्तमान में अक्सर कयी त्योहारों पर सजाया भी जाता है। वर्तमान में धुल से ख़राब होने की वजह से उन्हें कपड़ो से ढंका गया है।

चंद्र महल :

चंद्र महल या चंद्र निवास सिटी पैलेस की सबसे प्रसिद्द ईमारत है, जो महल के पश्चिमी अंत में बनी हुई है।

यह एक सात मंजिला ईमारत है और इसकी हर एक मंजिल को अलग-अलग नाम दिया गया है, जैसे की पीतम-निवास, सुख-निवास, रंग-मंदिर, श्री-निवास, चाबी-निवास, और मुकुट-मंदिर या मुकुट-महल। इस महल में बहुत सी आकर्षक पेंटिंग्स, शीशे और दीवारे बनी हुई है।

वर्तमान में, इस महल में जयपुर शासको के प्राचीन अनुयायी ही रहते है। केवल निचली मंजिल पर ही यात्रीयो को यहाँ जाने की अनुमति है, जहाँ एक म्यूजियम बना हुआ है, जिनमे हमें शाही परिवार से जुडी बहुत सी चीजे दिखाई देती है।

महल में प्रवेश लेते समय यहाँ एक सुंदर मोर द्वार भी बना हुआ है। साथ ही महल में बहुत सी सुंदर बालकनी भी है, जहाँ से जयपुर शहर का मनमोहक और अतिसुंदर रूप हमें दिखाई देता है।

गोविंद देवजी मंदिर :

गोविंद देवजी मंदिर हिन्दू भगवान श्री कृष्णा को समर्पित एक मंदिर है, जो शहर के परिसर में ही बना हुआ है। इसका निर्माण 18 वी शताब्दी के शुरू में ही किया गया था।

इस मंदिर में हमें यूरोपियन झूमर और भारतीय पेंटिंग भी देखने मिलती है। मंदिर की छतो को सोने के आभूषणों से सजाया गया है।

यह ऐसी जगह पर बना हुआ है की यहाँ के चंद्र महल परिसर से हम सीधे महाराजा को देख सकते है। आरती करते समय यहाँ पर भक्त दीन में केवल सात बार ही देवता को देखते है।

महारानी महल :

असल में महारानी महल शाही रानियों के रहने की जगह हुआ करती थी। लेकिन बाद में इसे म्यूजियम में परिवर्तित कर दिया गया, जहाँ शाही युद्ध के समय उपयोग की जाने वाले हथियारों को रखा गया है, इनमे से कुछ हथियारों का उपयोग 15 वी शताब्दी में भी किया गया है।

इस कक्ष की छतो पर अद्वितीय भित्तिचित्र किया गया है, जिन्हें गहनों की धुल से सजाया गया है। यहाँ प्रदर्शित किये गये मुख्य हथियारों में मुख्य रूप से कैची –कार्यात्मक कैची शामिल है।

हॉल में प्रदर्शित दुसरे हथियारों में एक तलवार है जिसपर पिस्तौल लगी हुई है, कहा जाता है की इस तलवार को रानी विक्टोरिया ने महाराजा सवाई राम सिंह को भेट स्वरुप दी थी।

बग्गी खाना :

सिटी पैलेस के महल परिसर में बग्गी खाना भी बना हुआ है, जो एक म्यूजियम है। यहाँ प्राचीन गाडी, पालकी और यूरोपियन टैक्सी को प्रदर्शित किया गया है।

आकर्षित करने वाली बग्गी को 1876 में वेल्स के प्रिंस ने महाराजा को भेट स्वरुप दी थी, जिसे विक्टोरिया बग्गी भी कहते है।यहाँ प्रदर्शित की गयी दूसरी चीजो में महाडोल भी शामिल है| 

जो एक बाम्बू से बनी पालकी है और इस पालकी का उपयोग पुजारियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाता था। साथ ही रथ यात्रा के समय हिन्दू देवी-देवताओ के लिए इस पालकी का उपयोग किया जाता था।

सिटी पैलेस जयपुर के बारे में दिलचस्प तथ्य – Interesting facts about city palace jaipur

इस विश्व प्रसिद्ध महल का निर्माण कार्य 16वीं शताब्दी में मेवाढ़ के प्रसिद्ध शासक उदय सिंह II द्वारा शुरू किया गया था, जिसे बाद में राजा के पुत्र महराणा प्रताप ने पूरा करवाया था।

इस महल पर कई साम्राज्यों के शासको ने हमला किया था, जिस कारण वर्ष 1818 ई. में यहाँ के शासक ने मराठाओ के बढ़ते आक्रमण को देखकर यह किला और क्षेत्र अंग्रेजो के साथ एक संधि कर उन्हें सौंप दिया था, जिसे 1948 के आस-पास भारत में मिला लिया गया था।

यह महल भारत के सबसे ऊँचे और विशालका्य महलो में से एक है, इस महल को एक 598 मीटर ऊँचे पठार पर बनाया गया था, यह महल लगभग 244 मीटर लंबा और 30.4 ऊँचा है।

इस महल का निर्माण वर्ष 1559 ई. में मेवाढ़ के प्रसिद्ध सिसोदिया शासको ने करवाया था, इस महल का निर्माण लगभग 76 से अधिक सिसोदियाओ की पीढियों ने करवाया था।

इस महल के निर्माण में प्रमुख योगदान उदय सिंह II ने दिया था जिन्होंने इसके भीतर और 11 छोटे-छोटे अलग महलो का निर्माण करवाया था।

इस महल में स्थित द्वारो को “पोल” कहा जाता था, इस महल का सबसे प्रमुख द्वार “बड़ी पोल” है जोकि इस महल के विशाल आंगन की ओर जाता है।

इस महल में स्थित अन्य प्रमुख द्वारो में से ‘ट्रिपोलिया पोल’ है जोकि 3 मेहराबदार द्वारो का मिश्रण है, इसका निर्माण वर्ष 1725 ई. में करवाया गया था।

इस महल के अंदर सबसे सर्वोच्च प्रांगण इसका अमर विलास महल है जो असल में एक ऊंचा बगीचा है। जो वर्गाकार में बनाया गया है जिसमे संगमरमर के टबो का भी उपयोग किया गया है।

यह मुगल शैली में एक आनंद मंडप के रूप में बनाया गया था।इस महल के भीतर स्थित “बड़ी महल” (ग्रेट पैलेस) जिसे गार्डन पैलेस भी कहा जाता है, वह एक 27 मीटर ऊँची उच्च प्राकृतिक चट्टान के केंद्रीय महल में स्थित है।

यह महल बहुमंजिला है अथवा इस महल में जगदीश मंदिर, स्विमिंग पूल इत्यादि चीजे सम्मिलित है। इस महल परिसर में स्थित भीम विलास एक गैलरी है जिसमें लघु चित्रों का संग्रह मौजूद है जो राधा-कृष्ण की वास्तविक जीवन की कहानियों को दर्शाते है।

इस महल में स्थित चीनी चित्रशाला (चीनी कला) चीनी और डच सजावटी टाइल्स के प्रदर्शन के लिए यहाँ पर दर्शाई जाती है। इस महल के परिसर में स्थित दिलखुशा महल (जॉय महल) भारत के सबसे खुबसुरत महलो में से एक है जिसका निर्माण वर्ष 1620 ई में किया गया था।

दरबार हॉल को वर्ष 1909 ई. में फतेहप्रकाश पैलेस के भीतर राज्य भोज और बैठकों जैसे आधिकारिक कार्यों के लिए एक स्थान के रूप में बनाया गया था।

इस महल के परिसर में फतेप्रकाश पैलेस जो अब एक लक्जरी होटल है, इसमें एक क्रिस्टल गैलरी है जिसमें क्रिस्टल कुर्सियां, ड्रेसिंग टेबल, सोफा, टेबल, कुर्सियां और बिस्तर, क्रॉकरी, टेबल फव्वारे शामिल हैं जिनका उपयोग कभी नहीं किया गया।

फतेप्रकाश पैलेस में स्थित वस्तुओं का आदेश महाराणा सज्जन सिंह ने वर्ष 1877 में लंदन के एफ एंड सी ओस्लर एंड कंपनी को दिया था जीसके तुरंत बाद उनकी मृत्यु हो गई जिसके बाद इन वस्तुओ को लगभग 110 कशो तक उपयोग में नही लाया गया था।

इस महल में स्थित मोर चौक (मोर वर्ग महल) इसकी सबसे प्रमुख संरचना है क्यूंकि इसमें इसमें स्थित मोरो की मूर्तियों को 5000 से अधिक टुकड़े के साथ तैयार किया गया था, जो हरे, सोने और नीले रंग के रंगों में चमकते है।

इस महल में स्थित शीश महल का निर्माण वर्ष 1716 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा अपनी पत्नी महारानी अजाबड़े के लिए बनाया गया था।

वर्ष 1974 ई. में इस महल परिसर के सबसे सुंदर महलो में से एक “जनाना महल” (महिलाओं चैंबर) को एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था।

इस महल परिसर के भीतर कई प्रमख महल स्थित है जिनमे से कृष्णा विलास, रंग भवन महल, लक्ष्मी विलास और मनक महल जैसी संरचनाये प्रमुख है।

सिटी पैलेस जयपुर एंट्री फ्री और खुलने का समय – city palace jaipur entry free and opening hours

सिटी पैलेस सुबह साढ़े नौ बजे से शाम पांच बजे तक खुला रहता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सिटी पैलेस रविवार को भी बंद नहीं होता है और पूरे सप्ताह, महिना और दिन खुला रहता है। सिटी पैलेस को अच्छे तरीके से घूमने में कुल डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है।

अगर आप पहली बार सिटी पैलेस देखने जा रहे हैं तो आपको गाइड या ऑडियो गाइड लेने की सलाह दी जाती है क्योंकि महल अपने इतिहास में बहुत समृद्ध है।

सिटी पैलेस में प्रवेश के लिए भारतीयों को 75 रुपये का शुल्क, बच्चों को 40 रुपये का शुल्क और विदेशियों को 300 रुपये प्रवेश शुल्क देना पड़ता है।

इसके अलावा यदि आप यहां फोटो खिंचना चाहते हैं और कैमरा लेकर जाना चाहते हैं तो आपको अलग से 50 रुपये का शुल्क और वीडियोग्राफी के लिए 150 रुपये का शुल्क देना पड़ेगा।

सिटी पैलेस जयपुर के आसपास घूमने की जगह – Places to visit around city palace jaipur

सिटी पैलेस जयपुर का एक ऐतिहासिक स्थल है और एक बहुत लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। रीगल वास्तुकला के अलावा यह पैलेस गुलाबी शहर का एक अद्भुत दृश्य प्रदान करता है और एक बीते युग की समृद्ध विरासत में एक अंतर्दृष्टि भी देता है।

सिटी पैलेस को देखने के अलावा आपको इसके आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल जैसे हवा महल, जल महल, गवर्नमेंट सेंट्रल म्यूजियम, बिरला मंदिर, अल्बर्ट हाल म्यूजियम नाहरगढ़ किला,स्वामी नारायण मंदिर, जंतर मंतर और विद्याधर गार्डन को जरुर देखना चाहिए।

शहर का महल जयपुर घूमने जाने का सबसे अच्छा समय – Best time to visit jaipur city palace

जयपुर जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर और मार्च के बीच होता है। इसका कारण यह है कि यह महीना अपेक्षाकृत ठंडा होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सिटी पैलेस काफी बड़ा है| 

इसके कई खंड हैं जो पूरी तरह से खुले हैं और इसलिए बहुत धूप निकलने से पहले इस जगह को घूमना अच्छा होता है। राजस्थान का हिस्सा होने के कारण जयपुर में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है|

इसलिए गर्मी के दिनों में सिटी पैलेस घूमने में पर्यटकों को काफी कठिनाई होती है।यही कारण है कि अक्टूबर से मार्च के बीच यहां भारी संख्या में पर्यटक आते हैं।

अगर आप सिटी पैलेस के सिर्फ अंदर के हिस्सों को देखना चाहते हैं तो आप यहां साल में किसी भी समय जा सकते हैं लेकिन यदि आप सिटी पैलेस का पूरा परिसर घूमना चाहते हैं तो सर्दी का मौसम सबसे सर्वोत्तम होगा।

सिटी पैलेस जयपुर कैसे पहुंचे – how to reach city palace jaipur

चूंकि सिटी पैलेस जयपुर शहर में स्थित है इसलिए इस शहर में आने के बाद आप बेहद आसानी से सिटी पैलेस पहुंच सकते हैं। यहां आने के लिए देश के प्रमुख शहरों से ट्रेन, बस एवं हवाई यातायात का विकल्प मौजूद है।

हवाई जहाज से जयपुर सिटी पैलेस कैसे पहुंचे –

जयपुर हवाई अड्डे को सांगानेर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कहा जाता है और सिटी पैलेस से लगभग 30 मिनट की दूरी पर स्थित है। जयपुर घरेलू उड़ानों द्वारा दिल्ली, मुंबई, उदयपुर, जोधपुर, औरंगाबाद, कलकत्ता और वाराणसी से जुड़ा हुआ है।

एयरपोर्ट के बाहर से आप प्रीपेड या रेडियो कैब सेवा या टैक्सी के माध्यम से सिटी पैलेस पहुंच सकते हैं।

ट्रेन से जयपुर सिटी पैलेस कैसे पहुंचे –

जयपुर रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। इस स्टेशन पर पहुंचने के बाद आप ऑटो, टैक्सी या फिर कैब से सिटी पैलेस पहुंच सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जयपुर रेलवे स्टेशन से सिटी पैलेस मात्र 30 मिनट की दूरी पर स्थित है।

बस से जयपुर सिटी पैलेस कैसे पहुंचे –

जयपुर के लिए राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और मुंबई के सभी प्रमुख स्थानों से राज्य परिवहन की बसें चलती हैं। इसके अलावा आप वोल्वो और लक्जरी एवं एसी बसों से भी यहां पहुंच सकते हैं।

जयपुर पहुंचने के बाद स्थानीय परिवहन जैसे टैक्सी, रिक्शा और कैब से सिटी पैलेस जाया जा सकता है।

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